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फ़रेब – मेरी Amanat 5/5 (1)

तेरे दिल के दफ़्तर में जो माशुकाएँ मंसूब रही हैं,
बेहिसाब, बे – तहाशा, वो खूब रहीं हैं…

तू खेलता रहा सिर्फ़ जिस्मों से उनके,
वो कहतीं हैं अब तलक़ तेरी महबूब रहीं हैं…

ताकतीं हैं सारी तेरी राह ख़ामोशी से,
तन्हाई के समंदर में वो डूब रहीं हैं..

किसे कहें क्या कहें कोई जवाब नहीं बचा,
ज़माने के सवालों से वो ऊब रहीं हैं…

इस शहर का हर पत्थर भी सुबूत है इस बात का,
आज भी तेरे झूठ से वो मज़्ज़ूब रहीं हैं…

…….. मेरी Amanat

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